सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता है। यह सभ्यता मुख्य रूप से दक्षिण एशिया के उत्तर - पश्चिमी क्षेत्रों में, जो आज तक उत्तर पूर्व अफगानिस्तान तक फैली हुई थी। सम्मानित पत्रिका नेचर में प्रकाशित शोध के अनुसार यह सभ्यता कम से कम 8000 वर्ष पुरानी है। इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है।
इस सभ्यता का विकास सिन्धु और घघ्घर नदी घाटी के किनारे हुआ था। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धौलाबीरा तथा राखीगढ़ी इस सभ्यता के प्रमुख केन्द्र थे। दिसम्बर 2014 में भिदारणा को सिन्धु घाटी सभ्यता का अब तक का खोजा गया सबसे प्राचीन नगर माना गया है। ब्रिटिश काल में हुई खुदाईयों के आधार पर पुरातत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों का अनुमान है कि यह अत्यंत विकसित सभ्यता थी और ये शहर अनेक बार बसे और उजड़े हैं।
7वीं शताब्दी में पहली बार जब लोगों ने पंजाब प्रान्त में ईटों के लिए मिटटी की खुदाई की तब उन्हें वहाँ से बनी बनाई ईंटें मिलीं जिसे लोगों ने भगवान का चमत्कार माना और उनका उपयोग घर बनाने में किया। उसके बाद 1826 में चार्ल्स मैसन ने पहली बार इस पुराणी सभ्यता की ओर ध्यान दिया। 1856 में कराची लाहौर के मध्य रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान बर्टन बन्धुओं द्वारा हड़प्पा स्थल की सूचना सरकार को दी गयी तब कनिंघम ने 1856 में इस सभ्यता के बारे में सर्वेक्षण किया। वहां स्थित टीले रेल लाइन बिछाने वाले मजदूरों के द्वारा बुरी तरह प्रभावित हुए थे। जिसने कनिंघम को काफी विचलित कर दिया। कनिंघम ने वहां से पाषाण औजार, अतिप्राचीन मृदभाण्डों के साथ-साथ साँड़ चित्र वाला एक मोहर भी प्राप्त किया, जिसके नीचे कुछ लिखा हुआ था। कनिंघम ने साँड़ के चित्र वाली मोहर जैसे सबसे महत्वपूर्ण तथ्य से अपना मुँह यह कहते हुए मोड़ लिया की कूबड़ नहीं होने की वजह से यह एक विदेशी सील है। इसी क्रम में 1861 में एलेक्जेंडर कनिंघम के निर्देशन में भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना की गयी।
1902 में लार्ड कर्जन द्वारा सर जॉन मार्शल को भारतीय पुरातात्विक विभाग का महानिदेशक नियुक्त किया गया। वर्ष 1921 में रायबहादुर दयाराम साहनी ने हड़प्पा का उत्खनन किया। इस प्रकार इस सभ्यता का नाम हड़प्पा सभ्यता रखा गया। वर्ष 1922 में राखालदास बेनर्जी ने मोहनजोदड़ो में उत्खनन किया।
यह सभ्यता सिन्धु नदी घाटी में फैली हुई थी इसलिये इस सभ्यता का नाम सिन्धु घाटी सभ्यता रखा गया। प्रथम बार नगरों के उदय के कारण इसे प्रथम नगरीय सभ्यता भी कहा जाता है। इस प्रकार प्रथम बार काँस्य धातु का प्रयोग होने के कारण इस काँस्य सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। आज तक सिन्धु घाटी सभ्यता के लगभग 1400 केन्द्रों को खोजा जा सका है] जिनमें से 925 केन्द्र भारत में हैं। 80 प्रतिशत स्थल सरस्वती नदी तथा उसकी सहायक नदियों के आस&पास हैं। अभी तक कुल 3 प्रतिशत स्थलों पर ही उत्खनन कार्य किया जा सका है। नए शोध में सिन्धु घाटी सभ्यता से भगवन शिव और नाग के प्रमाण भी मिले हैं जिस आधार पर कहा गया है कि यह सभ्यता निषाद जनजाति भील से सम्बंधित रही होगी।
सिन्धु घाटी सभ्यता का क्षेत्र अत्यंत व्यापक था। यह सिन्धु या इण्डस नदी के किनारे बसने वाली सभ्यता थी। अन्य स्थानों पर बसने वाले लोग अपनी भौगोलिक उच्चारण की भिन्नताओं के कारण इण्डस नदी को सिन्धु नदी कहने लगे, आगे चलकर यहाँ रहने वाले लोगों के लिए हिन्दू उच्चारण का प्रयोग किया जाने लगा।
सिन्धु नदी घाटी क्षेत्र में फैली होने के कारण इस सभ्यता का नाम सिन्धु घाटी सभ्यता रखा गया, परन्तु बाद में रोपड़, लोथल, कालीबंगा, बनावली तथा रंगपुर आदि क्षेत्रों से भी इस सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए जो सिन्धु तथा उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र से बहार थे। अतः कई इतिहासकार इस सभ्यता का प्रमुख केंद्र हड़प्पा होने के कारण इस सभ्यता को "हड़प्पा सभ्यता " नाम देना अधिक उचित समझते हैं।
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