Thursday, 30 December 2021

Banawali (बनावली)

बनावली  


बनावली- हरियाणा राज्य के हिसार जिले में रंगोई नदी के एक शुष्क प्रवाह मार्ग पर स्थित है। यहाँ मिले सुरक्षा दीवारों के बिच का भाग 300x500 मीटर है। यहाँ से हड़प्पा सभ्यता के प्रारंभिक, परिपक़्व तथा उत्तर हड़प्पा कालीन प्रमाण प्राप्त होते हैं। बनावली-II परिपकव हड़प्पा संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। 

    यहाँ स्थित सिटाडेल क्षेत्र और निचले नगर के बिच एक बड़ी दीवार खड़ी है। यहाँ से प्राप्त सिटाडेल की योजना लगभग बेलनाकार है, जिसके चारों ओर अतिरिक्त सुरक्षा प्राचीर तथा खोदी गयी खाई के प्रमाण प्राप्त होते हैं। सिटाडेल से निचले नगर में जाने के लिए कृत्रिम रूप से ऊँचा किया हुआ एक भू-भाग दिखाई देता है। मिटटी के बने मकानों के सामने चबूतरा बना हुआ है। बनावली में भट्टी में पकी हुई ईंटों का प्रयोग केवल कुँआ बनाने, स्नान क्षेत्र के लिए किया गया था। यहाँ से मिले एक बहुकक्षीय मकान से रसोईघर, शौंचालय, बहुत साड़ी मुहरें और बटखरे मिले हैं, इससे प्रतीत है कि यह किसी अमीर व्यापारी का घर रहा होगा। बनावली से प्राप्त एक दूसरे घर से सोना, लाजवर्द, कार्नेलियन के मनके और छोटे बटखरे मिले हैं, इनसे प्रतीत होता है कि यह किसी आभूषण व्यापारी का भवन रहा होगा। 

    बनावली में मुहरों की प्राप्ति केवल निचले क्षेत्र से हुई है, सिटाडेल क्षेत्र से नहीं। बनावली से पक्की मिटटी का एक खिलौना हल प्राप्त हुआ है। बनावली में बहुत सारे घरों में अग्निकुण्ड भी मिले हैं। बनावली से घेराबंदी एवं किलाबंदी के साक्ष्य भी मिले हैं। 


महत्वपूर्ण बिन्दु


  • बनावली- हरियाणा राज्य के हिसार जिले में रंगोई नदी के एक शुष्क प्रवाह मार्ग पर स्थित है।
  • यहाँ से पक्की मिटटी का खिलौना हल प्राप्त हुआ है। 
  • यहाँ से तौलने के लिए बाट भी प्राप्त हुए हैं। 
  • बनावली से घेराबंदी एवं किलाबंदी के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं। 
  • यहाँ से स्त्री देवी की मिटटी की मूर्तियां  प्राप्त हुई हैं, जिसे मातृदेवी की मूर्ति कहा जाता है। 
  • यहाँ से जौहरी अथवा सुनार का आवास भी प्राप्त हुआ है। 
  • बनावली से प्राप्त एक मकान के अवशेषों से वॉशबेसिन के प्रमाण मिले हैं।
  • बनावली सिन्धु सभ्यता का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जहाँ नाली व्यवस्था का अभाव है। 
  • बनावली में बहुत सारे घरों में अग्निकुण्ड के प्रमाण भी मिले हैं।
  • यहाँ से मिले एक बहुकक्षीय मकान से रसोईघर, शौंचालय, बहुत साड़ी मुहरें और बटखरे मिले हैं
  • बनावली में भट्टी में पकी हुई ईंटों का प्रयोग केवल कुँआ बनाने, स्नान क्षेत्र के लिए किया गया था। 

Wednesday, 29 December 2021

Rakhigarhi

 राखीगढ़ी 


राखीगढ़ी- दुनिया के सबसे बड़े एवं पुराने सिन्धु सभ्यता के स्थलों में से एक है, जो हरियाणा राज्य के हिसार जिले में सरस्वती तथा दृष्द्वती नदियों के शुष्क क्षेत्र में स्थित है। राखीगढ़ी सिन्धु घाटी सभ्यता के भारत में स्थित स्थलों में से धोलावीरा के पश्चात सबसे बड़ा ऐतिहासिक स्थल है। राखीगढ़ी की प्रमुख नदी घग्घर है। पुरातत्ववेत्ताओं ने हरियाणा स्थित राखीगढ़ी की खोज 1963 में की थी। राखीगढ़ी का व्यापक पैमाने पर उत्खनन अमरेन्द्र नाथ द्वारा वर्ष 1997-1999 के दौरान किया गया था। राखीगढ़ी से प्राक्क हड़प्पा तथा परिपक़्व हड़प्पा दोनों काल के प्रमाण प्राप्त होते हैं। यहाँ से मातृदेवी अंकित लघु मुद्रा प्राप्त हुई है। राखीगढ़ी से महत्वपूर्ण स्मारक एवं पुरावशेष प्राप्त हुए हैं, जिनमें दुर्ग-प्राचीर, अन्नागार, स्तम्भ युक्त मण्डप तथा यज्ञ वेदिकाएं प्रमुख हैं। 

राखीगढ़ी में लोगों के आने-जाने के लिए बने मार्ग, जल निकासी की प्रणाली, वर्षा जल को एकत्रित करने का विशाल स्थान तथा कांसा सहित कई धातुओं से बनी वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। 

    आज राखीगढ़ी अत्यधिक आर्थिक विकास के कारण विलुप्ति के कगार पर पहुँच चूका है। राखीगढ़ी को विश्व विरासत स्थलों की खतरे में एशिया के विरासत स्थल की सूची में रखा गया है।


महत्वपूर्ण बिन्दु 

  • राखीगढ़ी दुनिया के सबसे बड़े एवं पुराने सिन्धु सभ्यता के स्थलों में से एक है। 
  • हरयाणा राज्य के हिसार जिले में सरस्वती तथा दृष्द्वती नदियों के क्षेत्र में स्थित है। 
  • यह भारत में स्थित हड़प्पा सभ्यता के स्थलों में दूसरा सबसे बड़ा स्थल है। 
  • राखीगढ़ी की खोज 1963 में की गयी थी। 
  • यहाँ पर व्यापक पैमाने पर उत्खनन कार्य अमरेन्द्र नाथ द्वारा वर्ष 1997-1999 के दौरान किया गया था।
  • राखीगढ़ी से प्राक्क हड़प्पा, तथा परिपक़्व हड़प्पा कालीन पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। 
  • यहाँ से प्राचीन दुर्ग-प्राचीर भी प्राप्त हुई है। 
  • यहाँ से प्राचीन यज्ञ वेदिकाएँ प्राप्त हुई हैं। 
  • राखीगढ़ी में लोगों के आने-जाने के लिए बने मार्ग प्राप्त होते हैं। 
  • यहाँ से वर्षा जल को एकत्रित करने का विशाल स्थान भी प्राप्त हुआ है। 


Monday, 27 December 2021

Dholavira (धोलावीरा)

धोलावीरा

    धोलावीरा- गुजरात राज्य के कच्छ जिले की भचाऊ तालुका में स्थित एक पुरातात्विक स्थल है। यहाँ से सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेष और खण्डहर मिले हैं इसलिए धोलावीरा का सम्बन्ध सिन्धु घाटी सभ्यता से माना जाता है। धोलावीरा का नाम यहाँ से एक किलोमीटर दक्षिण में स्थित ग्राम के नाम पर पड़ा है। धोलावीरा सिन्धु घाटी सभ्यता के सबसे बड़े ज्ञात नगरों में से एक था। यह नगर भौगोलिक रूप से कच्छ के रण पर विस्तारित कच्छ मरुभूमि वन्य अभ्यारण्य के अन्दर खादिरबेट नामक द्वीप पर स्थित है। यह नगर 47 हेक्टेयर के चतुर्भुजीय क्षेत्रफल पर फैला हुआ था। यहाँ पर आबादी लगभग 2650 ई.पूर्व प्रारम्भ हुई उस ज़माने में यहाँ पर लगभग 50000 लोग रहा करते थे,आज से 4000 वर्ष पूर्व लगभग 2100 ई.पूर्व के बाद आबादी कम होने लगी थी। बहुत समय तक यहाँ पर कोई नहीं रहा, लेकिन 1450 ई.पूर्व  यहाँ पर लोग फिर से बसने लगे। लेकिन नए अनुसंधानों से ज्ञात होता है कि लोग 3500 ई.पूर्व से ही लोग यहाँ बसना आरम्भ हो गए थे। धोलावीरा 5000 वर्ष पूर्व विश्व के सबसे व्यस्त महानगरों में गिना जाता था।
    हड़प्पाकालीन नगर धोलावीरा की खोज वर्ष 1969 में पुरातत्वविद जगपति जोशी (जे.पी. जोशी) ने की थी। वर्ष 1989 से 1991 तक आर.एस. बिष्ट ने इस स्थान का उत्खनन किया था। धोलावीरा को वर्ष 2021 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। यह भारत का 40वां विश्व धरोहर स्थल है। 
    हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो की भांति धोलावीरा के लोग कौन सी भाषी बोलते थे तथा किस लिपि का प्रयोग लेखन कार्य में किया जाता था यह आज भी अज्ञात है। यहाँ विभिन्न प्रकार के लगभग 400 मूल संकेत पाए गए हैं। साधारणतया शब्दों की लिखावट दायें से बायीं दिशा की ओर मिलता है। इनमें से अधिकांश लिपियाँ मुहर तथा छाप के रूप में पायी गयी हैं। कुछ लिपि तांबे और कांसे के प्रस्तर तथा कुछ टेराकोटा और पत्थर के रूप में पायी गयी हैं। मुहरों से ऐसा प्रतीत होता है कि इनका उपयोग व्यापर और आधिकारिक प्रशासकीय कार्य हेतु किया जाता रहा होगा। 
    धोलावीरा सिन्धु घाटी सभ्यता का एकमात्र ऐसा स्थल था जो 3 भागों में विभाजित था। प्रान्त अधिकारियों के लिए तथा सामान्य जनता के लिए अलग-अलग विभाग थे। प्रान्त अधिकारियों का विभाग मजबूत पत्थर की सुरक्षित दीवार से बना था, जबकि अन्य नगरों का निर्माण कच्ची पक्की ईंटों से हुआ था। धोलावीरा का निर्माण चौकोर एवं आयताकार पत्थरों से हुआ है, जिन्हें समीप ही स्थित खदानों से लिया गया था। 
    धोलावीरा से प्राप्त साक्ष्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था, जहाँ पर सभी व्यापारी थे। यह कुबेरपतियों का महानगर था। यहाँ से प्राप्त साक्ष्यों से लगता है कि सिन्धु नदी यहीं पर समुद्र से मिलती थी। भूकंप के कारण धोलावीरा का सम्पूर्ण क्षेत्र ऊँचा-नीचा हो गया है। धोलावीरा में वर्तमान के महानगरों जैसी पक्की गटर व्यवस्था 5000 वर्ष पूर्व भी मौजूद थी। इस प्राचीन महानगर में पानी की व्यवस्था अद्भुत थी,यहाँ से चट्टान काटकर बनाये गए तालाबों के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं। यहाँ उत्तर से मनसर और दक्षिण से मनहर नामक छोटी नदी से पानी जमा होता था। इस पूरे महानगर से धार्मिक स्थलों के कोई अवशेष प्राप्त नहीं होते हैं। 
    धोलावीरा के सुरक्षित किले के एक महाद्वार के ऊपर उस समय का एक साईन बोर्ड अथवा शिलालेख पाया गया है। इस शिलालेख पर 10 बड़े-बड़े चिन्हों में कुछ लिखा गया है, जो 5000 वर्ष पश्चात भी सुरक्षित अवस्था में है, लेकिन इसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। जिस कारण यह आज भी रहस्य बना हुआ है कि वह महानगर का नाम है अथवा प्रान्त के अधिकारियों का नाम। धोलोवीरा से 16 जलाशयों की प्राप्ति होती है जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि इस नगर में जल प्रबंधन तथा वाटर हार्वेस्टिंग की उन्नत व्यवस्था थी।  


महत्वपूर्ण बिन्दु


  • धोलावीरा की खोज वर्ष 1969 में पुरातत्वविद जगपति जोशी (जे.पी. जोशी) ने की थी।
  • यह भारत में हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल है। 
  • धोलावीरा हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र ऐसा नगर था जो 3 भागों में विभाजित था। 
  • यह गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है। 
  • यहाँ से हड़प्पन लिपि के बड़े आकार के 10 चिन्हों वाला एक शिलालेख भी प्राप्त हुआ है, जिसे उस समय का साईन बोर्ड माना जा रहा है। 
  • यहाँ से हड़प्पन संस्कृति के सन्दर्भ में शैलकृत स्थापत्य के प्रमाण मिले हैं। 
  • धोलावीरा से 16 जलाशयों की प्राप्ति हुई है, जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि यहाँ पर उन्नत जल प्रबंधन व्यवस्था थी। 
  • यहाँ से पारसी गल्फ मुहर प्राप्त हुई है। 
  • यहाँ से हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र खेल का मैदान प्राप्त हुआ है। 
  • हड़प्पा सभ्यता की पहली खगोलीय पर्यवेक्षणशाला धोलावीरा से ही प्राप्त हुई है। 
  • इसे हड़प्पा सभ्यता का सबसे नवीन स्थल माना गया है। 
  • वर्ष 1989 से 1991 तक आर.एस. बिष्ट ने इस स्थान का उत्खनन किया था।
  • यहाँ से चट्टान काटकर बनाये गए तालाबों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। 
  • धोलावीरा को वर्ष 2021 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है।
  • यह भारत का 40वां विश्व धरोहर स्थल है। 
  • धोलावीरा कुबेरपतियों का महानगर था। 
  • इस पूरे महानगर से धार्मिक स्थलों के कोई अवशेष प्राप्त नहीं होते हैं।

Sunday, 26 December 2021

LOTHAL (लोथल)

लोथल

    लोथल- गुजरात के अहमदाबाद जिले में साबरमती और इसकी सहायिका भोगवा नदियों के बीच सरगवाला नामक ग्राम के समीप स्थित है। वर्तमान समय में यह समुद्रतट से 16-19 किलोमीटर दूर अवस्थित है, किन्तु आद्य ऐतिहासिक काल में खम्भात की खाड़ी से इस स्थान पर नावों का आवागमन बना हुआ था। यहाँ पर वर्ष 1954-55 में रंगनाथ राव के नेतृत्व में उत्खनन कार्य किया गया था। लोथल से समकालीन सभ्यता के 5 स्तर पाए गए हैं। लोथल सिन्धु घाटी सभ्यता का एकमात्र ऐसा स्थल है जो 2 भागों में विभाजित नहीं था अपितु पूरी बस्ती एक ही दीवार से घिरी हुई थी। लोथल के उत्तर में एक बाजार तथा दक्षिण में एक औधोगिक क्षेत्र था। यहाँ से मनके बनाने वालों, ताँबे तथा सोने का काम करने वाले शिल्पियों की उद्योगशालाएँ भी प्रकाश में आई हैं। 
    लोथल से एक घर से सोने के दाने, सेलखड़ी की चार मुहरें, सीप एवं ताँबे की बानी चूड़ियाँ और बहुत अच्छे से रंगा हुआ एक मिटटी का जार प्राप्त हुआ है। लोथल से शंख का कार्य करने वाले दस्तकारों और ताँबे का कार्य करने वाले कारखाने भी मिले हैं। नगर दुर्ग के पश्चिम की ओर विभिन्न आकार के 11 कमरे प्राप्त हुए हैं, जिनका प्रयोग मनके या दाना बनाने की फैक्ट्री के रूप में किया जाता था। यहाँ से मुख्य आवासीय क्षेत्र में कई बड़े भवन भी मिले हैं, जिनमे चार से छः कमरे, स्नानागार, एक विशाल आंगन और बरामदा बने हैं। कुछ भवनों में अग्निवेदी भी मिली है। लोथल में स्थित पतली सड़कों में से एक को बाजार वाली गली की संज्ञा दी गयी है। 
    लोथल के नगर क्षेत्र के बाहर की ओर उत्तर-पश्चिमी किनारे पर समाधि क्षेत्र मिला है, जहाँ 20 समाधियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। लोथल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि हड़प्पाकालीन बंदरगाह के अतिरिक्त विशिष्ट मृदभाण्ड, उपकरण, मुहरें, बाट तथा पाषाण उपकरण हैं। यहाँ से 3 युग्मित समाधि के उदहारण भी मिलते हैं। स्त्री-पुरुष शवाधान के साक्ष्य भी लोथल से ही प्राप्त होते हैं। लोथल की अधिकांश कब्रों में कंकालों के सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर मिले हैं। केवल अपवाद स्वरूप एक कंकाल की दिशा पूर्व-पश्चिम की ओर मिला है। 
    लोथल के पूर्वी भाग में स्थित बंदरगाह का औसत आकार 214x36 मीटर तथा गहराई 3.3 मीटर है। बंदरगाह की उत्तरी दीवार में 12 मीटर चौड़ा एक प्रवेश द्वार था जिससे जहाज आते-जाते थे ओर दक्षिणी दीवार में अतिरिक्त जल की निकासी के लिए भी एक द्वार था। यहाँ से अन्य अवशेषों के रूप में धान, फारस की मुहरें एवं घोड़ों की लघु मृण्मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। लोथल से प्राप्त एक मृदभाण्ड पर एक कौआ तथा एक लोमड़ी उत्कीर्ण है, इससे इसका सम्बन्ध पंचतंत्र की चालाक लोमड़ी से किया जाता है। यहाँ से उत्तर अवस्था की अग्निवेदी भी मिली है। नाव के आकार की 2 मुहरें तथा लकड़ी का एक अन्नागार मिला है। अन्न पीसने की चक्की, हाथी दांत तथा पीस का पैमाना भी मिला है। यहाँ से आटा पीसने के 2 पाट मिले हैं, जो पूरे सिन्धु का एकमात्र उदहारण है। यहाँ से बटन के आकार की एक मुद्रा भी प्राप्त हुई है। यहाँ से प्राप्त 65 टेराकोटा की छोटी मुहरों में हड़प्पा सभ्यता के चिन्ह साफ़ देखे जा सकते हैं जिसके एक पृष्ठ पर सरकंडा, चटाई, कपडा, मुड़ी हुई रस्सी आदि की छाप है और दूसरी ओर हड़प्पाई मुहरों वाले चिन्ह बने हुए हैं। 
    लोथल में उत्खनन से जो नगर-योजना तथा अन्य भौतिक वस्तुएँ प्रकाश में आई हैं, उनसे लोथल एक लघु हड़प्पा नगर प्रतीत होता है। समुंद्र तट पर स्थित सिन्धु-सभ्यता का यह स्थल संभवतः पश्चिमी एशिया के साथ व्यापार के दृष्टिकोण से सर्वोत्तम बंदरगाह था। 


महत्वपूर्ण बिन्दु 


  • सिन्धु घाटी सभ्यता का यह स्थल गुजरात के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के किनारे स्थित है। 
  • इसे लघु हड़प्पा/मोहनजोदड़ो नगर भी कहा जाता है। 
  • यहाँ पर वर्ष 1954-55 में रंगनाथ राव के नेतृत्व में उत्खनन कार्य किया गया था। 
  • लोथल हड़प्पा काल का सर्वप्रमुख बंदरगाह था। 
  • यहाँ से हाथी दाँत का पैमाना प्राप्त हुआ है। 
  • लोथल से घोड़े की 3 मृण्मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। 
  • कब्रिस्तान में पुरुष व महिलाओं को एक साथ दफ़नाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। 
  • लोथल से पंचतंत्र की चालाक लोमड़ी का अंकन प्राप्त हुआ है। 
  • लोथल को हड़प्पा सभ्यता की वाणिज्यिक राजधानी भी कहा जाता है। 
  • यह सिन्धु घाटी सभ्यता का एकमात्र स्थल है जहाँ से चावल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। 
  • यहाँ से तराजू तथा मापन के बाट भी मिले हैं। 
  • लोथल से सोने के मनकों का बना हार भी प्राप्त हुआ है। 
  • लोथल से दुकानों के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं। 
  • लोथल सिन्धु घाटी सभ्यता का एकमात्र स्थल है जो केवल एक भाग में विभाजित था। 
  • यहाँ से बटन के आकार की एक मुद्रा भी प्राप्त हुई है। 
  • लोथल पूरे सिन्धु घाटी सभ्यता का एकमात्र उदहारण है,जहाँ से आटा पीसने के 2 पाट मिले हैं। 
  • ताम्रकार अथवा मनके बनाने वाले शिल्पकारों के मकान प्राप्त हुए हैं। 

Saturday, 25 December 2021

Mohenjo-daro ( मोहनजोदड़ो )

मोहनजोदड़ो

 मोहनजोदड़ो- इस सभ्यता के ध्वंशावशेष पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के लरकाना जिले में सिन्धु नदी के दाहिने किनारे पर प्राप्त हुए हैं। यह नगर करीब 5 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। मोहनजोदड़ो के टीलों को 1922 में राखालदास बनर्जी ने खोजा  था। यहाँ पूर्व और पश्चिम दिशा  प्राप्त दो टीलों के अतिरिक्त सार्वजनिक स्थलों में एक विशाल स्नानागार एवं महत्वपूर्ण भवनों में एक विशाल अन्नागार के अवशेष भी मिले हैं। संभवतः यह अन्नागार मोहनजोदड़ो के वृहद भवनों में से एक है, जिसका आकार 150 x 75 मीटर है। इसके अतिरिक्त सभा भवन एवं पुरोहित आवास के ध्वंशावशेष भी मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुए हैं। पुरोहित आवास वृहत स्नानागार के उत्तर-पूर्व में स्थित था। मोहनजोदड़ो के पश्चिमी भाग में कुषाण शासकों ने एक स्तूप का निर्माण कराया था, इसलिए यहाँ स्थित दुर्ग टीले को स्तूप टीला भी कहा जाता है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त अन्य अवशेषों में कुम्भकारों के 6 भट्टों के अवशेष, सूती कपडा, हाथी का कपाल खण्ड, गले हुए तांबे के ढेर, सीपी की बनी हुई पटरी, एवं कांसे की नृत्यरत नारी की मूर्ती मिले हैं। 

    मोहनजोदड़ो के HR क्षेत्र से जो मानव प्रस्तर मूर्तियाँ मिली हैं, उनमें से दाढ़ी युक्त सिर विशेष उल्लेखनीय है। मोहनजोदड़ो के HR क्षेत्र से ही कांसे की नर्तकी की पूर्ण नग्न मूर्ती मिली है। मोहनजोदड़ो के अंतिम चरण से नगर क्षेत्र के अंदर मकानों तथा सार्वजानिक मार्गों पर 42 कंकाल अस्त-व्यस्त दशा में पड़े हुए मिले हैं। इसके अतिरिक्त मोहनजोदड़ो से लगभग 1398 मुहरें प्राप्त हुईं हैं, जो कुल लेखन सामग्री का 56.67% अंश हैं। पत्थर से बनी मूर्तियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शैलखड़ी से बना 19 सेमी. लम्बा पुरोहित का धड़ है। चूना पत्थर का बना एक पुरुष का सिर (14 सेमी.) विशेष उल्लेखनीय है। पशुपति शिव की मूर्ती तथा ध्यान की मुद्रा वाली आकृति भी उल्लेखनीय है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त पशुपति शिव की मुहर पर बैल का चित्र अंकित नहीं है। मोहनजोदड़ो की एक मुद्रा पर एक आकृति है जिसमें आधा भाग मानव का है तथा आधा भाग बाघ का है। यहाँ से एक सिलबट्टा तथा मिटटी का एक तराजू भी मिला है।

    मोहनजोदड़ो से अभी तक समाधी क्षेत्र के विषय में कोई जानकारी प्राप्त नहीं हुई है। मोहनजोदड़ो के नगर के अंदर शव विसर्जन के 2 प्रकार के साक्ष्य मिले हैं- (1) आंशिक शवाधान   (2) पूर्ण समाधिकरण। 



महत्वपूर्ण बिन्दु 

    • मोहनजोदड़ो का सामान्य अर्थ है- मृतकों का टीला 
    • राखालदास बनर्जी द्वारा वर्ष 1922 में मोहनजोदड़ो में उत्खनन कार्य किया गया था। 
    • यहाँ से किसी भी कब्रिस्तान का उल्लेख नहीं मिलता है। 
    • मोहनजोदड़ो के HR क्षेत्र से कांसे की नर्तकी की पूर्ण नग्न मूर्ती मिली है।
    • यहाँ से प्राप्त एक मुद्रा पर नाव का चित्रण मिलता है। 
    • क्षेत्रफल की दृष्टि से यह हड़प्पा काल का सबसे बड़ा नगर था। 
    • यह नगर करीब 5 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है।
    • यह पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के लरकाना जिले में सिन्धु नदी के दाहिने किनारे पर स्थित है। 
    • यहाँ से मिटटी से निर्मित घोड़े की आकृति मिली है। 
    • इसे नखलिस्तान के नाम से भी जाना जाता है। 
    • इसे एक अन्य नाम सिन्ध का बाग के नाम से भी जाना जाता है। 
    • सर जॉन मार्शल ने मोहनजोदड़ो में सप्त स्तरीय भवनों के निर्माण की खोज की थी, इसी की फलस्वरूप इनके अवशेषों को सप्तस्तरीय भग्नावशेष भी कहा जाता है। 
    • यहाँ से सूती कपड़ों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। 
    • मोहनजोदड़ो से सीप का बना पैमाना भी प्राप्त हुआ है। 
    • पशुपति शिव की आकृति की मुहर यहाँ से प्राप्त हुई है, जिसे रामनया अथवा तांत्रिक की मुहर भी कहा गया है। 
    • यहाँ से सर्वाधिक संख्या में मुहरें प्राप्त हुई हैं।
    • यहाँ से एक सिलबट्टा तथा मिटटी का एक तराजू भी मिला है। 
    • दाढ़ी युक्त पुरुष की चूने के पत्थर से बनी मूर्ति भी मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई है।
    • घरों के अंदर कुँए के प्रमाण मिले हैं। 
    • ताम्रपत्र पर अंकित प्रसिद्द वृषभ की आकृति भी मोहनजोदड़ो से प्राप्त होती है। 
    • मोहनजोदड़ो में कम से कम 4 प्रजातियां निवास करती थीं। 
    • मोहनजोदड़ो की एक मुद्रा पर एक आकृति है जिसमें आधा भाग मानव का है तथा आधा भाग बाघ का है।

Tuesday, 21 December 2021

सिन्धु घाटी सभ्यता के महत्वपूर्ण स्थल (Important Place Of Sindhu Ghati Sabhyata)

हड़प्पा 

मोहनजोदड़ो 

लोथल 

धोलावीरा 

राखीगढ़ी 

बनावली 

रंगपुर 

भीमबेटका 

रोपड़ 

चन्हूदड़ो 

दमदमा 

बुर्जहोम 

गुफकराल 

आलमगीरपुर 

मेहरगढ़ 

दैमाबाद 

कालीबंगा 

सुरकोटदा 

अल्लाहदीनो 


Wednesday, 15 December 2021

Harappa (हड़प्पा)

हड़प्पा 

    हड़प्पा- पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित मॉन्टगोमरी जिले में रावी नदी के बाएं तट पर स्थित है। हड़प्पा में ध्वंशावशेषों के विषय में सबसे पहले जानकारी 1826 में चार्ल्स मैन्सन ने दी थी। सर जॉन मार्सल के निर्देशन में 1921 में रायबहादुर दयाराम साहनी ने इस स्थल का उत्खनन कार्य कराया था। 1946 में मार्टीमर व्हीलर ने हड़प्पा के पश्चिमी दुर्ग टीले की सुरक्षा प्राचीर का स्वरूप ज्ञात करने के लिये यहाँ पर उत्खनन कार्य कराया था। इसी उत्खनन के आधार पर व्हीलर ने रक्षा प्राचीर एवं समाधि क्षेत्र के पारस्परिक सम्बन्धों को निर्धारित किया था।
    हड़प्पा नगर लगभग 5 किलोमीटर के क्षेत्र में बसा हुआ था। हड़पा से प्राप्त दो टीलों में पूर्वी टीले को नगर टीला तथा पश्चिमी टीले को दुर्ग टीले के नाम से सम्बोधित किया गया है। हड़प्पा का दुर्ग क्षेत्र सुरक्षा प्राचीर से घिरा हुआ था। दुर्ग की उत्तर से दक्षिण लम्बाई 420 मीटर तथा पूर्व से पश्चिम चौड़ाई 196 मीटर है। उत्खननकर्ताओं ने दुर्ग टीले को माउंट AB नाम दिया है। हड़प्पा के दुर्ग के बहार उत्तर दिशा में स्थित लगभग 6 मीटर ऊँचे टीले को F टीला कहा गया है, जिस पर अन्नागार, अनाज कूटने की वृत्ताकार चबूतरे और श्रमिक आवास के साक्ष्य मिले हैं।  हड़प्पा से प्राप्त अन्नागार नगरमढ़ी के बहार रावी नदी के निकट स्थित थे। हड़प्पा के F टीले में पकी हुई ईंटों से निर्मित 18 वृत्ताकार चबूतरे भी प्राप्त हुए हैं। प्रत्येक चबूतरे का व्यास 3.20 मीटर है। हर चबूतरे में संभवतः ओखली लगाने के लिए छेद था। मार्टीमर व्हीलर का अनुमान है कि इन चबूतरों का उपयोग अनाज पीसने के लिए किया जाता रहा होगा। 
    हड़प्पा के सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक ऐसा कब्रिस्तान स्थित है जिसे समाधि आर-37 नाम दिया गया है। यहाँ पर प्रारम्भ में माधोस्वरूप वत्स ने उत्खनन कराया था, बाद में मार्टीमर व्हीलर ने 1946 में यहाँ पर उत्खनन कराया था। यहाँ पर खुदाई से कुल 57 शवाधान पाए गए हैं। हड़प्पा में सन 1934 में एक अन्य समाधि मिली थी जिसे समाधि H नाम दिया गया था।  इस समाधि का सम्बन्ध सिन्धु सभ्यता के बाद के काल से था। 


महत्वपूर्ण बिन्दु

  • रायबहादुर दयाराम साहनी ने 1921 में यहाँ पर सर्वप्रथम उत्खनन कार्य किया था। 
  • हड़प्पा रावी नदी के तट पर स्थित है। 
  • अलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार हड़प्पा क्षेत्र 5 किलोमीटर में फैला हुआ था। 
  • अलेक्जेंडर कनिंघम ने उत्खनन से प्राप्त टीलों को A, B, C, D, E, F तथा थाना टीला में बाँटा था। 
  • 1928 तथा 1933 में टीला G तथा टीला H की खोज माधोस्वरूप वत्स ने की थी। 
  • हड़प्पा से 2 पहियों वाला ताँबे का रथ मिला है। 
  • टूटे हुए मटके प्राप्त हुए हैं। 
  • ताँबे व काँसे की मूर्तियाँ हड़प्पा से प्राप्त हुईं हैं। 
  • उर्वरता की देवी की मूर्ति भी हड़प्पा से प्राप्त हुईं हैं। 
  • अन्नागार प्राप्त हुआ है। 
  • अनाज कूटने के ईंटों से बने 18 वृत्ताकार चबूतरे हड़पा से प्राप्त हुए हैं। 
  • एक बर्तन पर बना मछुआरे का चित्र मिला है। 
  • शंख का बना बैल तथा पीतल का बना इक्का भी हड़प्पा से मिला है। 
  • श्रमिकों के आवास के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। 
  • समाधि आर-37 प्राप्त हुई है। 

Monday, 6 December 2021

Sindhu Ghati Sabhyata ( सिन्धु घाटी सभ्यता)


सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता है। यह सभ्यता मुख्य रूप से दक्षिण एशिया के उत्तर - पश्चिमी क्षेत्रों में, जो आज तक उत्तर पूर्व अफगानिस्तान तक फैली हुई थी। सम्मानित पत्रिका नेचर में  प्रकाशित शोध  के अनुसार यह  सभ्यता कम से कम 8000 वर्ष पुरानी है। इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। 

    इस सभ्यता का विकास सिन्धु और घघ्घर नदी घाटी के किनारे हुआ था। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धौलाबीरा तथा राखीगढ़ी इस सभ्यता के प्रमुख केन्द्र थे। दिसम्बर 2014 में भिदारणा  को सिन्धु घाटी सभ्यता का अब तक का खोजा गया सबसे प्राचीन नगर माना गया है। ब्रिटिश काल में हुई खुदाईयों के आधार पर पुरातत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों का अनुमान है कि यह अत्यंत विकसित सभ्यता थी और ये शहर अनेक बार बसे और उजड़े हैं। 

    7वीं  शताब्दी में पहली बार जब लोगों ने पंजाब प्रान्त में ईटों के लिए मिटटी की खुदाई की तब उन्हें वहाँ से बनी बनाई ईंटें मिलीं जिसे लोगों ने भगवान का चमत्कार माना और उनका उपयोग घर बनाने में किया। उसके बाद 1826 में चार्ल्स मैसन ने पहली बार इस पुराणी सभ्यता की ओर ध्यान दिया। 1856 में कराची  लाहौर के मध्य रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान बर्टन बन्धुओं द्वारा हड़प्पा स्थल की सूचना सरकार को दी गयी तब कनिंघम ने 1856 में इस सभ्यता के बारे में सर्वेक्षण किया। वहां स्थित टीले रेल लाइन बिछाने वाले मजदूरों के द्वारा बुरी तरह प्रभावित हुए थे। जिसने कनिंघम को काफी विचलित कर दिया।  कनिंघम ने वहां से पाषाण औजार, अतिप्राचीन मृदभाण्डों के साथ-साथ साँड़ चित्र वाला एक मोहर भी प्राप्त किया, जिसके नीचे कुछ लिखा हुआ था। कनिंघम ने साँड़ के चित्र वाली मोहर जैसे सबसे महत्वपूर्ण तथ्य से अपना मुँह यह कहते हुए मोड़ लिया की कूबड़ नहीं होने की वजह से यह एक विदेशी सील है। इसी क्रम में 1861 में एलेक्जेंडर कनिंघम के निर्देशन में भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना की गयी। 

    1902 में लार्ड कर्जन द्वारा सर जॉन मार्शल को भारतीय  पुरातात्विक विभाग का महानिदेशक नियुक्त किया गया। वर्ष 1921 में रायबहादुर दयाराम साहनी ने हड़प्पा का उत्खनन किया। इस प्रकार इस सभ्यता का नाम हड़प्पा सभ्यता रखा गया। वर्ष 1922 में राखालदास बेनर्जी ने मोहनजोदड़ो में उत्खनन किया। 

     यह सभ्यता सिन्धु नदी घाटी में फैली हुई थी इसलिये इस सभ्यता का नाम सिन्धु घाटी सभ्यता रखा गया। प्रथम बार नगरों के उदय के कारण इसे प्रथम नगरीय सभ्यता भी कहा जाता है। इस प्रकार प्रथम बार काँस्य धातु का प्रयोग होने के कारण इस काँस्य सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। आज तक सिन्धु घाटी सभ्यता के लगभग 1400 केन्द्रों को खोजा जा सका है] जिनमें से 925 केन्द्र भारत में हैं। 80 प्रतिशत स्थल सरस्वती नदी तथा उसकी सहायक नदियों के आस&पास हैं। अभी तक कुल 3 प्रतिशत स्थलों पर ही उत्खनन कार्य किया जा सका है। नए शोध में सिन्धु घाटी सभ्यता से भगवन शिव और नाग के प्रमाण भी मिले हैं जिस आधार पर कहा गया है कि यह सभ्यता निषाद जनजाति भील से सम्बंधित रही होगी। 

    सिन्धु घाटी सभ्यता का क्षेत्र अत्यंत व्यापक था। यह सिन्धु या इण्डस नदी के किनारे बसने वाली सभ्यता थी। अन्य स्थानों पर बसने वाले लोग अपनी भौगोलिक उच्चारण की भिन्नताओं के कारण इण्डस नदी को सिन्धु नदी कहने लगे, आगे चलकर यहाँ रहने वाले लोगों के लिए हिन्दू उच्चारण का प्रयोग किया जाने लगा। 

सिन्धु नदी घाटी क्षेत्र में फैली होने के कारण इस सभ्यता का नाम सिन्धु घाटी सभ्यता रखा गया, परन्तु बाद में रोपड़, लोथल, कालीबंगा, बनावली तथा रंगपुर आदि क्षेत्रों से भी इस सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए जो सिन्धु तथा उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र से बहार थे। अतः कई इतिहासकार इस सभ्यता का प्रमुख केंद्र हड़प्पा होने के कारण इस सभ्यता को "हड़प्पा सभ्यता " नाम देना अधिक उचित समझते हैं। 



सिन्धु घाटी सभ्यता के प्रमुख केन्द्र

Sunday, 5 December 2021

Pashankaal Important Questions (पाषाणकाल महत्वपूर्ण प्रश्न )



  1. मानव जीवन की लिखित घटनाओं को कहा जाता है- इतिहास 
  2. इतिहास का पिता कहा जाता है- हेरोडोटस 
  3. जिस काल की घटनाओं एक कोई लिखित प्रमाण प्राप्त नहीं होता है, उसे कहा जाता है- प्रागैतिहासिक काल 
  4. मानव द्वारा प्रयुक्त सर्वप्रथम अनाज था- जौ 
  5. पुरालेखशास्त्र को कहा जाता है- एपिग्राफी 
  6. मनुष्य का उद्भव स्थान माना जाता है- अफ्रीका 
  7. भीमबेटका के गुफा चित्र किस राज्य में स्थित हैं- मध्यप्रदेश में 
  8.  मनुष्य के जीवाश्म कहलाते हैं- फॉसिल्स 
  9. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का मुख्यालय स्थित है- 24 जनपथ मार्ग, नई दिल्ली
  10.  भारत में मानव के जिस रूप के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, उसे कहा  जाता है- रामापिथेकस 
  11. लंबवत पुरातात्विक उत्खनन के द्वारा किसी संस्कृति के जिस  पक्ष का ज्ञान होता है- संस्कृति के काल मापन का 
  12. भारत की प्रथम पुरापाषाण कालीन संस्कृति की खोज प्रारम्भ की थी- रोबर्ट ब्रूस फूट ने 
  13. भारत में किस स्थान से पुरापाषाण कालीन अवशेष  प्राप्त हुए हैं- पटने , महाराष्ट्र से 
  14. पुरापाषाण काल के मानव संभवतः जिस प्रजाति के थे- निग्रेटो प्रजाति के
  15. परिस्कृत औजारों का युग माना जाता है- उच्च पुरापाषाण काल 
  16. मध्य पुरापाषाण काल को अन्य जिस नाम से भी जाना जाता है- फलक संस्कृति के नाम से 
  17. आधुनिक मानव के अस्तित्व का काल है- उच्च पुरापाषाण काल 
  18. मध्य पुरापाषाण काल के हथियार कहलाते हैं- माइक्रोलिथ / लघुपाषाण 
  19. मध्य पुरापाषाण काल को फलक संस्कृति नाम दिया था- एच. डी. संकालिया ने 
  20. सर्वप्रथम तीर-कमान का विकास जिस काल में हुआ था- मध्य पुरापाषाण काल में 
  21. मध्य पुरापाषाण काल के  गुफा चित्रों में सर्वाधिक चित्रकारी मिलती है- हिरन की 
  22. नवपाषाण काल के सर्वप्रथम प्रमाण जिस स्थान से प्राप्त होते हैं- लिंगसगुर से (मैसूर समीप )
  23. नवपाषाण काल के लिए नियोलिथिक शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया था- सर जॉन लुबाक ने 1865 में 
  24. मानव द्वारा प्रयुक्त सर्वप्रथम अनाज जौ को अन्य जिस नाम से भी जाना जाता था- यव 
  25. कश्मीर के दो महत्वपूर्ण नवपाषाण कालीन स्थल हैं- बुर्जहोम तथा गुफकराल 
  26. गर्त निवास का साक्ष्य मिलता है- बुर्जहोम से 
  27. ताम्रपाषण कालीन गेंहू, दाल और धान की खेती के प्रमाण किस स्थान से प्राप्त हुए हैं- नवदाटोली से 
  28. नवदाटोली का उत्खन्न किया था- एच. डी. संकालिया ने
  29. प्रमुख ताम्रपाषाणिक संस्कृतियाँ हैं- मालवा संस्कृति, जोर्वे संस्कृति, आहड़ संस्कृति, कायथा संस्कृति, रंगपुर संस्कृति 
  30. पहिये का आविष्कार सर्वप्रथम जिस काल में हुआ था- नवपाषाण काल में 
  31. आदिम मानव ने स्थायी बसावट जिस प्रारम्भ की थी- नवपाषाण काल में 
  32. पहली बार पाषाणकालीन औजार जिस स्थान प्राप्त हुए थे- रायचूर, कर्नाटक से 
  33. आदिम मानव का सर्वप्रथम औजार माना जाता है- हस्तकुठार 
  34. भारतीय पुरातत्व का जनक माना जाता है- अलेक्जेंडर कनिंघम को 
  35. ताम्र पाषाणिक काल का अन्य नाम है- चालकोलिथिक 
  36. ताम्र पाषाणिक काल की सबसे बड़ी बस्ती मिली है- इनामगांव, महाराष्ट्र से 
  37. मध्य पुरापाषाण काल के अस्तित्व की पुष्टि हुई है- मॉस द अजिल, फ़्रांस से 
  38. मृतक संस्कार तथा अग्नि का प्रयोग किया जाने लगा था- मध्य पुरापाषाण काल में 
  39. मध्य पाषाणिक सन्दर्भ में वन्य धान का प्रमाण प्राप्त होता है- चोपानी माण्डो से 
  40. वह एकमात्र नवपाषणिक स्थल जहाँ से चावल/धान का प्रमाण प्राप्त होता है- कोल्डिहवा 
  41. प्राचीनतम कलाकृतियों का प्रमाण सम्बंधित है- उच्च पुरापाषाण काल से 
  42. पशुपालन सर्वप्रथम प्रारम्भ हुआ था- मध्य पाषाण काल में 
  43. खद्दानों की कृषि सर्वप्रथम जिस काल में प्रारम्भ हुई थी- नवपाषाण काल में 
  44. दक्षिण भारत की महापाषाणिक समाधियाँ जिस काल से सम्बंधित हैं- लौह काल से 
  45. वह नवपाषणिक स्थल जहाँ से राख का टीला प्राप्त हुआ है- संगम कल्लू, कर्नाटक से 

Thursday, 2 December 2021

Pashan kaal (पाषाण काल )

   पाषाण युग इतिहास का वह काल है जब मानव का जीवन पत्थरों (संस्कृत - पाषाणः) पर अत्यधिक आश्रित था। उदाहरणार्थ पत्थरों से शिकार करना, पत्थरों की गुफाओं में शरण लेना, पत्थरों से आग पैदा करना इत्यादि। पाषाण युग तीन चरण माने जाते हैं, पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल एवं नवपाषाण काल जो मानव इतिहास के आरम्भ (२५ लाख साल पूर्व) से लेकर काँस्य युग तक फैला हुआ है।


पुरापाषाण काल (Paleolithic Era)

    250000 ई.पू. से 10000 ई.पू. तक।

पुरापाषाण काल यूनानी भाषा में Palaios प्राचीन तथा Lithos पाषाण के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इन्ही शब्दों के आधार पर 'पाषाणकाल' शब्द बना। यह काल आखेटक एवं खाद्य-संग्राहक काल के रूप में भी जाना जाता है। अभी तक भरम में पूरा पाषाणकालीन मनुष्य के शारीरिक अवशेष कहीं से भी प्राप्त नहीं हुए हैं।  भारत में इस काल में प्रयुक्त होने वाले पत्थर के उपकरणों के अवशेष सोहन, बेलन तथा नर्मदा नदी घाटी में प्राप्त हुए हैं। प्राप्त उपकरणों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि  ये लगभग 250000 ई.पू. के होंगे। भोपाल के पास स्थित भीमबेटका नामक चित्रित गुफाएं, शैलाश्रय तथा अनेक कलाकृतियां प्राप्त हुई हैं। इस काल के विशिष्ट उपकरण- हैण्ड-ऐक्स (कुल्हाड़ी) ,क्लीवर और स्क्रेपर आदि थे।

    सम्भवतया 5 लाख वर्ष पूर्व द्वितीय हिमयुग के आरंभकाल मेंं भारत में मानव अस्तित्व मेंं आया। लेकिन हाल ही में महाराष्ट्र के बोरी नामक स्थान पर खुदाई में मिले अवशेषों से ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि पृथ्वी पर मानव की उपस्थिति लगभग 14 लाख वर्ष पूर्व मानी जा सकती है । पुरापाषाण काल में मानव के औज़ार और हथियार कुल्हाड़ी, पत्थर, तक्षणी, खुरचनी तरह छेदनी आदि थे, जो परिष्कृत और तीक्ष्ण नहीं थे। इस समय के मनुष्यों का जीवन पूर्णरूप से शिकार पर निर्भर था। इस काल मेंं अग्नि का आविष्कार हुआ था परन्तु इस काल का मानव अग्नि के प्रयोग से अनभिज्ञ था। संभवतः इस काल का मनुष्य नीग्रेटो जाति का था। 

    पुरापाषाणकाल में प्रयुक्त होने वाले प्रस्तर उपकरणों के आकार एवं जलवायु में होने वाले परिवर्तन के आधार पर इस काल को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:-

1. निम्न पुरापाषाण काल (250000-100000 ई.पू.)

2. मध्य पुरापाषाण काल (100000-40000 ई.पू.)

3. उच्च पुरापाषाण काल (40000-10000 ई.पू.)



मध्यपाषाण काल (Mesolithic Era)

    10000 ई.पू. से लेकर 7000 ई.पू. तक। 

मध्यपाषाण काल पुरापाषाण व नवपाषाण काल के मध्य का संक्रमण का काल है ।इस काल तक हिमयुग पूरी तरह से समाप्त हो चुका था तथा जलवायु गर्म तथा आद्र हो चुकी थी । जिसका प्रभाव पशु-पक्षी तथा मानव समूह पर पड़ा

बड़े पाषाण उपकरणों के साथ-साथ लघु पाषाण उपकरण का प्रचलन भी मिलता है । ये उपकरण 1-8 से.मी. लंबे , विभिन्न आकार वाले – जैसे त्रिकोण , नवाचंद्राकार , अर्द्धचंद्राकार , ब्लेड आदि मिलते हैं।

मध्य पाषाण काल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी मनुष्य को पशुपालक बनाना एवं अग्नि का प्रयोग। इस काल में आखेट के क्षेत्र में भी परिष्कार हुआ, अब मनुष्य तीक्ष्ण तथा परिष्कृत औजारों का प्रयोग करने लगा । प्रक्षेपास्र तकनीकि प्रणाली का विकास ( छोटे पक्षियों को मारने वाले छोटे उपकरण ) इसी काल में हुआ। तीर – कमान का विकास भी इसी काल में हुआ । बङे पशुओं के साथ-साथ छोटे पशु – पक्षियों एवं मछलियों के शिकार में विकास संभव हुआ।मध्यपाषाण कालीन मानव कंकाल के अवशेष उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के सराय नाहर राय से प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाणकालीन मानव का जीवन भी शिकार पर अधिक निर्भर था। इस समय तक लोग पशुओं में गाय, बैल, भेड़, बकरी, घोड़े एवं भैंसों का शिकार करने लगे थे।

मध्यपाषाण कालीन स्थल राजस्थान , दक्षिणी उत्तरप्रदेश , मध्य भारत , पूर्वी भारत , दक्षिण भारत में कृष्णा नदी के दक्षिण क्षेत्र अर्थात राजस्थान से मेघालय तक व उत्तरप्रदेश से लेकर सुदूर दक्षिण तक प्राप्त हुए हैं ।

मध्य पाषाणकाल के अंतिम चरण में कुछ साक्ष्यों के आधार पर प्रतीत होता है कि इस समय के लोग कृषि एवं पशुपालन की ओर आकर्षित हो रहे थे। इस समय की प्राप्त समाधियों से स्पष्ट होता है कि लोग अंत्येष्टि क्रिया से भी परिचित थे। मानव अस्थिपंजर के साथ कहीं-कहीं पर कुत्ते के अस्थिपंजर भी मिले हैं जिनसे प्रतीत होता है कि कुत्ता मनुष्य का प्राचीनतम सहचर था। राजस्थान के बागौर तथा आदमगढ़ से इस काल के लोगों द्वारा भेड़ें, बकरियां रखे जाने के साक्ष्य मिले हैं  जो मध्यपाषाण कालीन पशुपालन के प्राचीनतम अवशेष माने जाते हैं।


नवपाषाण काल (Neolithic Era)

    7000  ई.पू. से बाद का समय।  

नियोलिथिक युग या नव पाषाण युग मानव प्रौद्योगिकि के विकास की एक अवधि थी जिसकी शुरुआत मध्य पूर्व में 9500 ई.पू. के आसपास हुई थी, जिसे पारम्परिक रूप से पाषाण युग का अंतिम हिस्सा माना जाता है। नियोलिथिक युग का आगमन सीमावर्ती होलोसीन एपिपेलियोलिथिक अवधि के बाद कृषि की शुरुआत के साथ हुआ और इसने " नियोलिथिक क्रान्ति " को जन्म दिया; इसका अन्त भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर धातु के औजारों के ताम्र युग (चालकोलिथिक) या कांस्य युग में सर्वव्यापी होने या सीधे लौह युग में विकसित होने के साथ हुआ। नियोलिथिक कोई विशिष्ट कालानुक्रमिक अवधि नहीं है बल्कि यह व्यावहारिक और सांस्कृतिक विशेषताओं का एक समूह है जिसमें जंगली और घरेलू फसलों का उपयोग और पालतू जानवरों का इस्तेमाल शामिल है।

    नई खोजों से पता चला है कि नियोलिथिक संस्कृति का आरम्भ एलेप्पो से 25 किमी उत्तर की तरफ उत्तरी सीरिया में टेल कैरामेल में 10,700 से 9,400 ई.पू. के आसपास हुआ था। पुरातात्विक समुदाय के भीतर उन निष्कर्षों को अपनाए जाने तक नियोलिथिक संस्कृति का आरम्भ लेवंत में लगभग 9,500 ई.पू. के आसपास माना जाता है। 

    9500-9000 ई.पू. तक लेवंत में कृषक समुदाय का जन्म हुआ और वे एशिया माइनर, उत्तर अफ्रीका और उत्तर मेसोपोटामिया में फ़ैल गए। आरंभिक नियोलिथिक खेती केवल कुछ पौधों तक ही सीमित थी जिनमें जंगली और घरेलू दोनों तरह के पौधे शामिल थे जिनमें एंकोर्न गेहूं, बाजरा और स्पेल्ट (जर्मन गेहूं) और कुत्ता, भेड़ और बकरीपालन शामिल था। लगभग 8000 ई.पू. तक इसमें पालतू जानवर और सूअर शामिल हुए और स्थायी रूप से या मौसम के अनुसार बस्तियाँ बसाई गई और बर्तन का इस्तेमाल शुरू हुआ। नव पाषाणकाल में चावल की खेती का प्राचीनतम साक्ष्य प्रयागराज के निकट 'कोल्डिहवा' नामक स्थान से मिलता है, जिसका समय 7000-6000 ई.पू. माना जाता है। 

    कृषिपालन का प्रारम्भ तो नव पाषाणकाल में अवश्य हुआ था, परन्तु सर्वप्रथम किस स्थान पर कृषि कार्य प्रारम्भ हुआ यह आज भी विवाद का विषय है। 1977 से चल रही खुदाई में अब तक प्राप्त साक्ष्यों से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सिंध और बलूचिस्तान की सीमा पर स्थित कच्छी मैदान में बेलन नदी के किनारे मेहरगढ़ नामक स्थान पर सर्वप्रथम कृषिपालन प्रारम्भ हुआ था। कुम्भकुमारी सर्वप्रथम इसी काल में दृष्टिगोचर होती 

    नवपाषाणकाल के मानव का बौद्धिक स्तर पूर्वपाषाणकाल स्तर से काफी विकसित हो गया था। इस समय जो औजार बने उनके बनाने में एक विशेष तकनीक अपनाई गई, उन्हें घिसकर और पॉलिश करके बनाया जाता था। सबसे पहले पत्थर की फलक उतारी जाती थी। फिर उबड़-खाबड़ हिस्सों को ठीक किया जाता था। 

तत्पश्चात् उसकी घिसाई की जाती थी फिर उस पर Animal-fat आदि लगाकर पॉलिश की जाती थी।इस प्रकार मानव ने चिकने चमकदार तथा सुडौल हथियार बनाने की विधि का अविष्कार किया इसमें कठोर पत्थर की पालिशदार कुल्हाडी प्रमुख है। इस काल में हथौडे़, छैनी, खुर्पा, कुदाल, हल, हसिया तथा सिलकर का प्रयोग किया जाने लगा। ये औजार कृषि और शिकार में प्रयोग किए जाने लगे। कम और ज्यादाा मात्रा में प्रत्येक site से प्रमाण मिले हैं। भूमि खोदने के लिए सामान्यत: नुकीली छड़ी जिसके सिरे पर सुराख करके पत्थर लगा होता था, का प्रयोग होता था।



 धातु युग (Metal Period)


    पत्थर और धातु में एक बड़ा अंतर है। पत्थर को तराशा तो जा सकता है, लेकिन उसे पीट कर या गला कर मनमाफिक आकार नहीं दिया जा सकता।  धातु में यह गुण विद्यमान होता है। उन्हें पीट कर और गला कर मनमाफिक आकार में लाया जा सकता है। ठंडा होने पर यदि इनकी सख्ती भी पत्थरों जैसी हो जाती है, तब इनका महत्व बढ़ जाता है।
    पाषाण युग अथवा पत्थर युग के बाद धातु का युग आया, जिससे मानव जीवन में एक बड़ा परिवर्तन आया था। वेदों में भी धातुओं का वर्णन मिलता है। ऋग्‍वेद में अयस (लोहा) एवं हिरण्‍य (सोना) और इनके अतिरिक्‍त वेदों में तॉंबा (copper), कॉंसा (bronze), सीसा (lead) और रॉंगा (tin) का भी वर्णन मिलता है। यजुर्वेद में अयस्‍ताप यंत्र (iron smelter) का भी उल्‍लेख आया है जो खनिज को लकड़ी, कोयला आदि के साथ तपाकर धातु बनाता था। भारत को इतिहास में स्‍वर्ण देश ( जहॉं सोना पैदा होता है) कहा गया है। भारत ने संसार को स्‍वर्ण मानक (gold standard) दिया। राजस्‍थान में तॉंबे की प्राचीन अपसर्जित खदानों के चिन्‍ह हैं, जिनमें दो-तीन सहस्‍त्र वर्ष पूर्व खनिज समाप्‍त होने पर काम बंद हो गया। तॉंबे का प्रयोग हथियार, औजार और पात्र बनाने में होता था। धीरे-धीरे प्रस्‍तर उपकरणों का स्‍थान ताम्र उपकरणों ने ले लिया।
    
धातु युग को दो भागों में विभाजित किया गया है- 1) काँस्य युग    2) लौह युग 

1) काँस्य युग- कांस्य धातु के पूर्व कॉपर, जिंक और टीन जैसे जो उपलब्ध धातु थे, वे अपेक्षित रूप से कठोर नहीं थे। वे पत्थरों जैसी कठोरता का काम नहीं कर सकते थे, इसलिए उनका स्थान भी नहीं ले सकते थे। तॉंबे के उपकरणों की धार जल्‍दी नष्‍ट हो जाती है, परन्तु यदि तॉंबे और रॉंगे की मिश्र धातु (alloy) बनाई जाए तो इस प्रकार कॉंसा प्राप्त होता है, काँसा या कांस्य एक कठोर धातु है, जिसका संधान मनुष्य ने किया था।  इस गुण के कारण इस धातु का संधान, मनुष्य जाति के हाथ में एक बड़ी उपलब्धि थी।  काँसा धातु के प्रयोग के प्रमाण सिंधु घाटी की सभ्‍यता के प्रारंभ से देखने को मिलते हैं। भारत में तॉंबा और जस्‍ता (Zinc) के खनिज साथ-साथ प्राप्‍त होते हैं। इनकी मिश्र धातु पीतल (brass) का बीसवीं सदी तक भारत में प्रयोग होता रहा है। पुरातत्‍वज्ञ इन यूरोपीय प्रागैतिहासिक कालखंडों को कॉंस्‍य काल ( bronze age) कहकर पुकारते हैं। भारत में त्रिशूल तथा चक्र अथवा पहिया इसी काल की देन है। 

 2) लौह युग- लौह अर्थात लोहा, जिससे आज हर कोई पूरी तरह परिचित है। आज तो हमारी सभ्यता के रेशे-रेशे से यह जुड़ा है। यह कल्पना  करना ही अजीब लगता है कि बस तीन हज़ार वर्ष पूर्व तक हम इस धातु से परिचित नहीं थे। इतिहासकारों का मानना है भारत में लोहे की खोज आज से तीन हज़ार वर्ष पूर्व हुई। संसार के कुछ दूसरे हिस्सों में इससे दो सौ साल पहले। यानी लौह युग ईसा से अधिक से अधिक एक हज़ार दो सौ(1200) साल पहले आरम्भ हुआ।लोहा प्राकृतिक स्तर पर ताम्बा, टीन और जस्ता की अपेक्षा प्रचुर मात्रा में मिलने वाला धातु पदार्थ है। लेकिन इसकी खोज उन सबकी खोज के लगभग दो हजार वर्ष बाद हुई। चुम्बकीय गुणों से भरपूर इस धातु को खोजने का श्रेय भारत में असुर जनजाति को है। बिहार-झारखंड, तक्षशिला, तमिलनाडु, कर्नाटक और  देश के अन्य हिस्सों में हुई पुरातात्विक खुदाइयों में लोहे से बनी चीजें मिली हैं।
    लौह-युग ने उस क्रांति को अधिक तेज बना दिया जिसका आरम्भ कांस्य-युग में हुआ था। वनों को खत्म तो खांडव वन की तरह आग से जला कर भी किया जा सकता था, लेकिन उसे कृषि लायक बनाने के लिए गैंती, खंते, फाबड़े आदि की बड़े पैमाने पर जो जरुरत थी, वह लोहे से ही पूरी की जा सकती थी। लोहे के बने औजारों से कृषि-भूमि का विस्तार हुआ। लोहे के बने फाल जब हल में जुटे तब खेतों की गुड़ाई गहरी होने लगी। इससे उन खेतों में भी कृषि संभव हुई जहाँ मुलायम  मिटटी नहीं थी। गहरी गुड़ाई से धान की खेती बड़े पैमाने पर संभव हुई, जो अबतक छोटे पैमाने पर होती थी। सस्ती कीमत की कुदाल-फाबड़ों की बेशुमार संख्या ने अधिक से अधिक कृषि को संभव बनाया। धान की पैदावार बढ़ने का एक नतीजा और आया।



Banawali (बनावली)

बनावली    बनावली- हरियाणा राज्य के हिसार जिले में रंगोई नदी के एक शुष्क प्रवाह मार्ग पर स्थित है। यहाँ मिले सुरक्षा दीवारों के बिच का भाग 3...